शौनक ऋषि के बारे में जानकारी
हिन्दू पुराणों ने काल को मन्वंतरों में विभाजित कर प्रत्येक मन्वंतर में हुए ऋषियों के ज्ञान और उनके योगदान को परिभाषित किया है। प्रत्येक मन्वंतर में प्रमुख रूप से 7 प्रमुख ऋषि हुए हैं। इन्हीं ऋषियों में से एक थे ऋषि शौनक। आओ जानते हैं इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी।
शौनक ऋषि एक वैदिक आचार्य । शौनक ऋषि अंगिरस्गोत्रीय शनुहोत्र ऋषि के पुत्र थे, परंतु बाद में भृगु-गोत्रीय शनुक ने इन्हें अपना पुत्र मान लिया था। जिस कारण इन्हें शौनक पैतृक नाम प्राप्त हुआ था।
शौनक ऋषि का पूरा नाम इंद्रोतदैवाय शौनक था।
शौनक ऋषि ने ऋक्प्रातिशाख्य, ऋग्वेद छंदानुक्रमणी, ऋग्वेद ऋष्यानुक्रमणी, ऋग्वेद अनुवाकानुक्रमणी, ऋग्वेद सूक्तानुक्रमणी, ऋग्वेद कथानुक्रमणी, ऋग्वेद पादविधान, बृहदेवता, शौनक स्मृति, चरणव्यूह, ऋग्विधान आदि अनेक ग्रंथ लिखे हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने ही शौनक गृह्सूत्र, शौनक गृह्यपरिशिष्ट, वास्तुशा्सत्र ग्रंथ की रचना भी की थी।
शौनक ऋषि ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया।
संसार के पहले कुलपति : शौनक ऋषि
महाभारत के अनुसार शौनक ऋषि ने ही राजा जनमेजय का अश्वमेध और सर्पसत्र नामक यज्ञ कराया था।
शौनक ऋषि जिस प्रकार विद्यादान किया करते थे उसका ढंग दूसरा होता था। ऋषि शौनक ने अपने समय में विद्या दान की प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन किए। उन्होंने बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को एक स्थान पर रखकर उनके लिए वे सारी सुविधाएं उपलब्ध कराईं जो आज के विद्याध्ययन केंद्रों के पास उपलब्ध होती हैं। यद्यपि आज के विद्याध्ययन केंद्रों और ऋषि शौनक या उनसे पूर्व के ऋषियों के विद्याध्ययन केंद्रों अर्थात गुरुकुलों के परिवेश में जमीन आसमान का अंतर है। जहां हमारे प्राचीन ऋषियों के गुरुकुल या विश्वविद्यालय या शिक्षा केंद्र पूर्णतया सात्विक और आध्यात्मिक परिवेश से परिपूर्ण होते थे, वहीं आज के तथाकथित शिक्षा केंद्रों में विलासिता सर चढ़कर बोलती है। नैमिषारण्य में स्थापित किए गए उस शिक्षा केंद्र को ऋषि शौनक ने जिस प्रकार आध्यात्मिकता के रंग से रंगा उससे पता चलता है कि वे भारत के प्राचीन वैदिक ऋषियों की चिंतनधारा को आगे बढ़ाने का ही कार्य कर रहे थे।
शिक्षा केंद्र के कुलपति के रूप में यदि ऋषि शौनक को विशेष सम्मान के दृष्टिकोण से देखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का परिशीलन किया जाए तो पता चलता है कि उनके पश्चात जब भारतवर्ष में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई तो उनके मूल प्रेरणा स्रोत के रूप में ऋषि शौनक का ही नाम लिया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोषों को थोड़ी देर अलग कर और आधुनिक शिक्षा केंद्रों में व्याप्त विलासिता पूर्ण परिवेश को भी कुछ देर के लिए उपेक्षित करके देखा जाए तो पता चलता है कि ऋषि शौनक द्वारा स्थापित किए गए भव्य भवन की आधारशिला पर ही उसकी अनुकृति के रूप में ये शिक्षा केंद्र आज काम कर रहे हैं।
शौनक ऋषि जहां प्राचीन काल में शिक्षा महारथी के रूप में सम्मानित हुए वहीं वे आज की शिक्षा और शैक्षणिक क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हो सकते हैं। उनके चिंतन दर्शन को यदि आज अपना लिया जाए तो जहां कुलपति अपनी पवित्र भूमिका का निर्वाह करने में सक्षम हो सकते हैं, वहीं शिक्षा राष्ट्र निर्माण का एक सशक्त और उपयोगी माध्यम भी हो सकती है। पुराणों में ऐसा भी उल्लेख है कि कलियुग के दोषों का दहन करने के लिए नैमिषारण्य में ऋषि शौनक ने 12 वर्ष तक निरंतर विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। इस प्रकार ऋषि परमार्थ के लिए जीवन भर कार्य करते रहे। प्राचीन काल में शिक्षा का उद्देश्य परमार्थ के लिए ही युवाओं को तैयार करना होता था। ऋषि शौनक स्वयं परमार्थ का प्रतीक बन चुके थे। परमार्थ के लिए तपस्या करने वाले इस ऋषि ने अपने गुरुकुल से जिन हजारों युवाओं का निर्माण कर संसार के उपकार के लिए निकाला था उनका वह कार्य ही उनको मान्यता प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।
भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मजबूती देने और उसे सर्वग्राही बनाने में ऋषि शौनक के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने गुरु शिष्य परंपरा का विस्तार किया। इसे संसार के लिए उपयोगी बनाकर यज्ञ परंपरा का भी विशेष विस्तार किया।