अहोई आठें अश्टमी व्रत की कहानी
जिस स्त्री को बेटा हुआ हो अथवा बेटे का विवाह हुआ हो तो उसे अहोई माता की पूजा करनी चाहिए। इसके लिए एक थाली में 7 जगह 7-7 पूड़े रखकर इसके साथ ही एक तीयल साड़ी ब्लाउज उस पर सामथ्र्यानुसार रूप्ये रखकर थाली में चारोे ओर हाथ फेरकर श्रद्धापूर्वक सासू जी के पांव लगकर व सभी सामान सासू को दिया जाता है। तीयल तथा रूप्ये सासूजी अपने पास रख लें तथा पूड़ों का बायना बांट दे, बहन बेटी तथा जो भी मान लगतें हों उनके भी बायना भेजना चाहिए। इसके विशय में एक कथा है जो कि निम्न प्रकार से हैः-
एक साहूकार था जिसके 7 बेटेे, 7 बहुऐं तथा एक बेटी थी। दीवाली से पहले कार्तिक बदी अश्टमी को सातों बहुयें अपनी इकलौती ननद के साथ जंगल में खदान से मिट्टी खोद रही थी वहीं स्याऊ (सेई़) की मांद थी, मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से सेई का बच्चा मर गया। स्याऊ माता बोली कि अब मैं तेरी कोख बांधूगी। तब ननद अपनी सातों भाभियों से बोली कि तुम मेरे बदले कोई अपनी कोख बांध लो। सब भाभियों ने कोख बंधवाने से इंकार कर दिया परन्तु छोटी भाभी सोचने लगी कि यदि मैं कोख नही बंधवाऊंगी तो सासूजी नाराज होगीं ऐसा विचार कर ननद के बदले छोटी भाभी ने अपनी कोख बंधवा ली। इसके बाद उसके जो लड़का होता वो 7 दिन बाद मर जाता एक दिन उसने पंडित बुलाकर पूछा मेरी संतान 7 वें दिन क्यों मर जाती है। तब पंडित ने कहा कि तुम सुरही गाय की पूजा किया करो, सुरही गाय स्याऊ माता को भाती है, यह कोख छोड़े तब तेरा बच्चा जियेगा। इसके बाद से वह बहू प्रातःकाल उठकर चुपचाप सुरही गाय के नीचे सफाई आदि कर जाती। गौ माता बोली कि आजकल कौन मेरी सेवा कर रहा है, सो आज देखूंगी। गौ माता खूब तड़के उठी क्या देखती है कि एक साहूकार के बेटे की बहू उसके नीचे सफाई आदि कर रही है। गौ माता उससे बोली क्या मांगती है? तब साहूकार की बहू बोली कि स्याऊ माता माता आपको बहुत मानती है और उन्होनें मेरी कोख बांध रखी है सो मेरी कोख खुलवा दो। गौ माता ने कहा अच्छा, तब तो गौ माता समुद्र पार अपनी भायली के पास उसको लेकर चलीं, रास्ते में कड़ी धूप थी सो वे दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गई। थोड़ी देर में एक सांप आया और उसी पेड़ पर गरूड़ पंखनी (पक्षी) का बच्चा था। उसको डसने लगा तब साहूकार की बहू ने सांप मारकर ढाल के नीचे दबा दिया और बच्चों को बचा लिया। थोड़ी देर में गरूड़ पंखनी आई तो वहां खून पड़ा देखकर साहूकार की बहू के चोंच मारनें लगी तब साहूकारनी बोली कि मैंने तेरे बच्चे को नहीं मारा बल्कि सांप तेरे बच्चे को डसने आया था मैंने तो उससे तेरे बच्चो की रक्षा की है। यह सुनकर गरूड़ पंखनी बोली कि मांग तु क्या मांगती है? वह बोली 7 समुद्र पार स्याऊ माता रहती है मुझे तू उसके पास पहुंचा दे। तब गरूड़ पंखनी ने दोनों को अपनी पीठ पर बिठाकर स्याऊ माता के पास पहुंचा दिया। स्याऊ माता उन्हें देखकर बोली कि आ बहन बहुत दिनों से आई फिर कहने लगी कि बहन मेरे सिर में जूं पड़ गई है। तब सुरही के कहने पर साहूकार की बहू ने सलाई से उसकी जूयें निकाल दी। इस पर स्याऊ माता प्रसन्न हो बोली कि तूने मेरे सिर में बहुत सलाई गेरी हैं इसलिए तेरे सात बेटे और बहू होंगी वह बोली मेरे तो एक भी बेटा नहीं 7 बेटे कहां से होंगे। स्याऊ माता बोली-क्यों क्या बात है? तब वह बोली मुझे वचन दें तो बताऊॅं। स्याऊ माता बोली- वचन दिया, वचन से फिरूंगी तो धोबी के कुण्ड पर कंकरी होऊं तब साहूकार की बहू बोली मेरी कोख तो तुम्हारे पास बंद पड़ी है। यह सुन स्याऊ माता बोली कि तूने मुझे ठग लिया, मैं तेरी कोख खेलती तो नहीं। परन्तु अब खोलनी पडे़गी। जा तेरे घर तुझे 7 बेटे और 7 बहुऐं मिलेंगी तू जाकर उजमन करिये। 7 अहोई बनाकर 7 कढ़ाई करियो। वह लौटकर घर आई तो वहां देखा 7 बेटा 7 बहुऐं बैठें हैं वह खुष हो गई। उसने 7 अहोई बनाई 7 उजमन किए तथा 7 कढ़ाई कीं। दीवाली के दिन जेठानियां आपस में कहनें लगीं कि जल्दी-2 धोके पूजा कर लो, कहीं छोटी बच्चों को याद करके रोने लगे। थोड़ी देर में उन्होंने अपने बच्चों से कहा-अपनी चाची के घर जाकर देख आओ कि आज वह अभी तक रोई क्यों नहीं? बच्चों ने जाकर कहा कि चाची तो कुछ मांड रही हैं, खूब उजमन हो रहा है। यह सुनते ही जेठानियां दौड़ी-2 घर आयीं और जाकर कहने लगीं कि तूने कोख कैसे छुड़ाई? वह बोली तुमने तो कोख बंधाई नहीं सो मैंने कोख बंधा ली। अब स्याऊ माता से कृपा करके मेरी कोख दी । स्याऊ माता ने जिस प्रकार उस साहूकार की बहू की कोख खोली उसी प्रकार हमारी भी खोलियो। कहने वाले तथा सुनने वाले की तथा सब परिवार की कोख खोलियो।
बोलो स्याऊ माता की जय।