त्रयोदषी ब्रत कथा
एक ब्राह्मण था। वह रोज षिवजी व पार्वती जी की पूजा किया करता था। एक दिन पार्वती जी ने कहा कि यह ब्राह्मण रोज तुम्हारी पूजा करता है तुम इसकी इच्छा पूरी क्यो नही करते। भोले नाथ ने कहा कि यह एक सन्तान चाहता है लेकिन इसके भाग्य में कोई सन्तान नही है। इसलिए इसे सन्तान दे दें। लेकिन पार्वती जी ने जिद करके कहा इसे सन्तान आवष्यक हो। अगले दिन ब्राह्मण फिर पूजा करने आया। तब भोले नाथ ने ब्राह्मण से कहाॅं तुझे एक साल के लिए बाहर पुत्र चाहिऐ या बारह साल के लिए एक पुत्र। ब्राह्मण ने कहा मुझे एक पुत्र दे दो। ताकि मे उसे खिला कर अपनी इच्छा पूरी कर सकूॅं। तब भोले नाथ ने कहाॅं जा ऐसा ही होगा। और ब्राह्मण चला गया। कुछ दिनों बाद ब्राह्मण कि पत्नी गर्भवती हो गई। और नौ महीने बाद उसके पुत्र हुआ। लेकिन ब्राह्मण को इतनी खुषी नही हुई। क्योकि वह केवल बारह साल के लिए ही हुआ था। वह लड़का थोड़ा बडा हुआ सब कहने लगे इसकी षादी कर दो। तो ब्राह्मण ने कहाॅ जो लड़की सदा सुहागन होगी उसी से अपने पुत्र की षादी करूगाॅं। और ब्राह्मण घर से लड़की देखने निकल पड़ा। ब्राह्मण कई जगह गया। एक जगह जाकर देखा कि वहां छोटी-2 लड़कियाॅं मिटटी का मकान बना कर खेल रही थी। वह लड़कियाॅं कभी मकान बनाती तो कभी बिगाडती लेकिन वही पर एक लड़की बैठी अपना मकान बना रही थी तब ब्राह्मण ने कहाॅं तू मकान क्यो नही बिगाड़ती तो उसने कहा मैं क्यो बिगाडूं मेरा तो सदा बना रहेगा। तब ब्राह्मण ने कहाॅं जा अपनी माॅं से कह दे हम अपने पुत्र की षादी तुझसे कराना चाहते हैं। उसने अपनी माॅं से जाकर कहा माॅं ने कहाॅ कि कहां हम गरीब और कहां वो ब्राह्मण। तो ब्राह्मण ने कहा जिस धोती में है उसी धोती मे ले जाउंगा। ब्राह्मण ने उसकी षादी अपने बेटे से करा दी। अब वे चारों खुषी से रहने लगे। कुछ दिनों बाद ब्राह्मण बहुत दुखी रहने लगा। तब बहूं ने कहा क्या बात है। ससूर जी को मेरा आना भाया नही जो वे बहुत चुप-चुप से रहते हैं। तब ब्राह्मण ने कहा ऐसी बात नही है हमे भोले नाथ व पार्वती जी ने यह पुत्र बारह साल के लिए दिया है। अब हम तुम्हें कैसे देखेगे। तब बहू ने कहा जब आप दोनों उनकी पूजा कि तब तुम्हें यह पुत्र दिया अगर चारो मिलकर पूजा करेगें तो मेरा सुहाग नही छिनेगा। बहू ने कहा एक महल बनवा दो और चार दरवाजे लगवाकर चार चीजों के पहरे लगवा दो। एक जल का एक अग्नि का एक वायु का और अन्न का। ब्राह्मण ने ऐसा ही किया महल बनवाकर चारो तरफ चारो चीजों का पहरा बिठवा दिया। चारो अन्दर जा कर बैठ गये। जब बारह साल पुरे हुए तो भोले नाथ ने अपने दूत भेजे। जाओ उस लड़के को लेकर आओ। उसके दिन पूरे हो गये हैं। दूत एक दरवाजे पर आया तो वहां पर देखा जल का पहरा लगा हुआ था दूतों ने कहा खोल किवाड़। अन्दर से आवाज आई जल के बिना दुनिया जिये तो खोल दे। ऐसा सुनकर दूत वापस चले गये। और भोले नाथ से जाकर अन्होने सब कुछ बता दिया। और कहा कि तुम लोग दूसरे दरवाजे पर जाओ वे दूसरे दरवाजे पर गये तो वहां अग्नि का पहरा था। अन्होने कहा कि खोल किवाड़ अन्दर से आवाज आई कि अग्नि के बिना दुनिया जिये तेा खोल दे किवाड़। वह तीसरे दरवाजे पर गये वहां वायु का पहरा लगा हुआ था। उन्होने कहा कि खोल किवाड़ अन्दर से आवाज आई कि वायु बिना दुनिया जिये तो खोल किवाड़। वह फिर वापस चले गये। पार्वती जी ने कहा ऐसी कौन सी औरत है जो अन्दर नही जाने देती। अन्होने कहा कि मैं जाती हूं। षिवजी ने कहा कि तुम मत जाओ। तुम जरूर गडबड कर दोगी। वह कहने लगी कि मैं जाउंगी और वह चली गई। चैथे दरवाजे पर गई तो वहां पर अन्न का पहरा लगा हुआ था। पार्वती जी ने कहा कि खोल किवाड़। अन्दर से आवाज आई अन्न के बिना दुनिया जिये तो खोल किवाड़। पार्वती जी ने कहा हाथ की अगुंली पैर का अगुठा लगाया कि एक दम दरवाजे खुल गए। पार्वती जी अन्दर चली गई। बहु ने जल्दी पार्वती की पैर छुऐ। पार्वती ने कहा सदा सुहागन रहो। और सात बच्चों की माॅं हो और उस लड़के को ले जाने लगी। बहूं ने कहा उन्हें क्यो ले जा रही हो। पार्वती जी ने कहा उसके दिन पूरे हो गये हैं। बहू ने कहा आपने जो वरदान दिया है उसका क्या होगा। पार्वती जी कहने लगी ये क्या हो गया। वे तो वही माथे पर हाथ रख कर बैठ गई। बहुत देर हो जाने पर भोले नाथ वहां पहुच गये। कहने लगे क्या हुआ पार्वती जी। पार्वती बोली इस लड़के को जीवित करो। नही तो मैं वचन हार जाउंगी। भोले नाथ कहने लगे मुझे पहले ही पता था। तुम जरूर कुछ गडबड करोगी। पार्वती जी कहनें लगी कुछ भी हो उसे जरूर ठीक करो। भोले नाथ ने कमंडल में से जल छिड़का। लड़का हर-हर करता जी उठा। जैसे भोले नाथ व पार्वती माता ने सबका सुहाग अमर किया वैसा सबका सुहाग अमर करना।